जिनिगी  के  समय  हेरा के पवले  के  बाटे

जिनिगी  के  समय  हेरा के पवले  के  बाटे

बूढ़ी   समइया   पथ  पर  धवले  के  बाटे

 

बचपन  से  गोड़  सम्हार  के राखऽ  ए भाई

गिरल  मुसाफिर  कबो   उठवले   के  बाटे

 

हँसत  खेलत  अदमी के  गर्दन  रेतल जाता

लेकिन  मूअल  आदमी  कबो  जीयवले के बाटे

 

बा केतना  दिन से  पहरा  उनका  इनरा पर

पियासल  मनई  के  पियास  मिटवले के बाटे

 

राह  कुराहे  चलते  ध्यान  रहे एतना सबका

पाप से  भरल लंका  के आग बुतवले के बाटे

 

अब  कुर्बानी होते रही धरम धरम की खेला में

धरती  पर गुजुर  गुजुर  धरम बनवले के बाटे

 

आदमी जाल फेंकेला अपनो ओही में फँस जाला

अब रोअला से का होई ई व्यूह रचवले के बाटे

 

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